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हिन्दू धर्म में श्राद्ध का क्या महत्व हैं. आज से श्राद्ध या पितृ पक्ष .

हिन्दू धर्म में श्राद्ध का क्या महत्व हैं.  आज से श्राद्ध या पितृ पक्ष .

हिन्दू धर्म में माता - पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है. इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं. जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है. श्राद्ध या पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों का तर्पण कराते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं. ऐसी मान्यता है कि जो लोग पितृ पक्ष में पूर्वजों का तर्पण नहीं कराते, उन्हें पितृदोष लगता है. इससे मुक्ति पाने का सबसे आसान उपाय पितरों का श्राद्ध कराना है. श्राद्ध करने के बाद ही पितृदोष से मुक्ति मिलती है. श्राद्ध को पितृ पक्ष और महालय के नाम से भी जाना जाता है. वहीं उत्तर भारत के हरियाणा राज्य में श्राद्ध को कनागत भी कहा जाता हैं. 

बता दे हिन्दू कैलेंडर ( पंचांग ) के अनुसार श्राद्ध हर वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों तक होते हैं जिसमे हम जिसमे हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं.  हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी श्राद्ध भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक होगा . इस वर्ष श्राद्ध या पितृ-पक्ष 24 सितंबर 2018 सोमवार से शुरू हो रहा है जो की 8 अक्टूबर 2018 सोमवार तक रहेगा.

सनातन धर्म के अनुसार श्राद्ध तीन पीढ़ियों तक होता है. दरअसल, देवतुल्य स्थिति में तीन पीढ़ियों के पूर्वज गिने जाते हैं. पिता को वासु, दादा को रूद्र और परदादा को आदित्य के समान दर्जा दिया गया है. श्राद्ध मुख्य तौर से पुत्र, पोता, भतीजा या भांजा करते हैं. जिनके घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं है, उनमें महिलाएं भी श्राद्ध कर सकती हैं. लेकिन इस दौरान कुछ काम नहीं करने चाहिए वरना श्राद्ध कर्म में कमी मानी जाती है.

वहीं ईशा धार्मिक संसथान के सतगुरु श्री जग्गी वासुदेव हिन्दू धर्म के अनुसार श्राद्ध के महत्त्व को समझाते हुए  बताते हैं, " श्रद्धा, संस्कृत वृद्ध, ने हिंदू धर्म में श्रद्धा को भी लिखा, एक मृत पूर्वजों के सम्मान में एक समारोह किया गया. संस्कार सभी नर हिंदुओं  पर एक सामाजिक और धार्मिक जिम्मेदारी दोनों में शामिल है। बेटों के जन्म के लिए भारत में दिया गया महत्व यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता को दर्शाता है कि किसी की मृत्यु के बाद श्रद्धा समारोह करने के लिए पुरुष वंशज होगा. 

संस्कार मृत पिता, दादा, और दादाजी और मां, दादी और दादी के लिए भी किया जाता है. इसका उद्देश्य पृथ्वी पर अपने पुनर्जन्म और पुन: प्रकट होने से पहले, उनकी तीर्थयात्रा में मृतकों की आत्माओं को पोषित करने, संरक्षित करने और समर्थन करने का इरादा है. संस्कार जाति परंपराओं के आधार पर, और इसके बाद नियमित अंतराल पर मृत्यु के बाद 11 वें और 31 दिन के बीच किया जाता है. पहली वार्षिक मौत की सालगिरह एक श्रद्धा समारोह द्वारा देखी जाती है जो मृतक (प्रीता) को पूर्वजों (पिट्री) की सभा में भर्ती करने में सक्षम बनाता है.
साथ ही सतगुरु श्री जग्गी वासुदेव से श्राद्ध के महत्व को लेकर पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं, “भारत में, यदि आपके करीब कोई व्यक्ति मर जाता है, तो आपको बैठना और देखना होगा - कोई भी अकेले मृत शरीर को छोड़ देता है. यदि आप शरीर को दो से तीन दिनों तक रखते हैं, तो बाल उगेंगे. अगर यह एक आदमी था और वह दाढ़ी करता था, तो आप इसे चेहरे के बालों से देख सकते हैं। नाखून भी बढ़ेग.  इसलिए, उन देशों में जहां वे लंबे समय तक मृत शरीर को संरक्षित करते हैं, उपक्रम नाखूनों को क्लिप करते हैं और दाढ़ी को दाढ़ी देते हैं.  ऐसा इसलिए होता है जिस तरह से जीवन प्रकट होता है. समझने के लिए - मौलिक जीवन और शारीरिक जीवन है। शारीरिक जीवन ऊर्जा, जिसे आम तौर पर प्राण के रूप में जाना जाता है, में पांच मूल अभिव्यक्तियां होती हैं. इन्हें सामाना, प्राण, उधाना, अपाना और व्याना कहा जाता है.” 

बता दे की वर्ष 2018 में पितृ-पक्ष 24 सितंबर 2018 सोमवार से शुरू हो रहा है. यह 8 अक्टूबर 2018 सोमवार तक रहेगा. निम्न लिखित तिथियों की सूचि को देखिये .  सूची और जानें, किस दिन कौन सा श्राद्ध है.

24 सितंबर 2018 सोमवार पूर्णिमा श्राद्ध
25 सितंबर 2018 मंगलवार प्रतिपदा श्राद्ध
26 सितंबर 2018 बुधवार द्वितीय श्राद्ध
27 सितंबर 2018 गुरुवार तृतीय श्राद्ध
28 सितंबर 2018 शुक्रवार चतुर्थी श्राद्ध
29 सितंबर 2018 शनिवार पंचमी श्राद्ध
30 सितंबर 2018 रविवार षष्ठी श्राद्ध
1 अक्टूबर 2018 सोमवार सप्तमी श्राद्ध
2 अक्टूबर 2018 मंगलवार अष्टमी श्राद्ध
3 अक्टूबर 2018 बुधवार नवमी श्राद्ध
4 अक्टूबर 2018 गुरुवार दशमी श्राद्ध
5 अक्टूबर 2018 शुक्रवार एकादशी श्राद्ध
6 अक्टूबर 2018 शनिवार द्वादशी श्राद्ध
7 अक्टूबर 2018 रविवार त्रयोदशी श्राद्ध, चतुर्दशी श्राद्ध
8 अक्टूबर 2018 सोमवार सर्वपितृ अमावस्या, महालय अमावस्या

पितृ पक्ष के सबसे आखिरी दिन को महालय अमावस्या के नाम से जाना जाता है. इसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहते हैं. क्योंकि इस दिन उन सभी मृत पूर्वजों का तर्पण करवाते हैं, जिनका किसी न किसी रूप में हमारे जीवन में योगदान रहा है. बता दे की श्राद्ध के अंतिम दिवस पर  पूर्वजो प्रति आभार प्रक्रट करते हैं और उनसे अपनी गलतियों की माफी मांगते हैं. इस दिन किसी भी मृत व्यक्ति का श्राद्ध किया जा सकता है. खासतौर से वह लोग जो अपने मृत पूर्वजों की तिथि नहीं जानते, वह इस दिन तर्पण करा सकते हैं. 
वहीं पूर्णिमा, जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई हो, उनका श्राद्ध पितृ पक्ष के पहले दिन होता है.
 

श्राद्ध में क्या करे और क्या न करे 

•    पितृ पक्ष के दौरान जो पुरुष अपने पितरों को जल अर्पण कर श्राद्ध, पिंडदान आदि देते हैं, उन्हें जब तक पितृ पक्ष चल रहा है तब तक शराब और मांस को भी हाथ नहीं लगाना चाहिए.

•    पंडितों को जब भी भोजन परोसें तो उन्हें गंदे आसन पर न बैठाएं. वहीं खाना परोसते वक्त कुछ बात न करें और न किसी की प्रशंसा करें. वहीं खाना परोसते वक्त बैठने, खाना रखने आदि के लिए कुर्सी का प्रयोग न करें.

•    रात का वक्त राक्षसों का वक्त माना गया है. इसलिए रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए. वहीं संध्या के वक्त भी श्राद्ध कर्म करना सही नहीं माना जाता है. इसके अलावा युग्म दिनों (एक ही दिन को दो तिथियों का मेल) और अपने जन्मदिन पर भी श्राद्ध नहीं करना चाहिए.

•    किसी दूसरे व्यक्ति के घर या जमीन पर श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए. हालांकि जंगल, पहाड़, मंदिर या पुण्यतीर्थ किसी दूसरे की जमीन के तौर पर नहीं देखे जाते हैं क्योंकि इन जगहों पर किसी का अधिकार नहीं होता है. इसलिए यहां श्राद्ध किया जा सकता है.

•    माना जाता है कि श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन करवाना जरूरी होता है. जो इंसान बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते और श्राप देकर वापस लौट जाते हैं.

•    यदि ब्राह्मणों को भोजन करना संभव न हो तो आप कन्याओ को भी भोजन करा सकते हैं.


श्राद्ध करने का सही समय
कुतुप मुहूर्त : 11:48 से 12:36 तक
रौहिण मुहूर्त : 12:36 से 13:24 तक
अपराह्न काल : 13:24 से 15:48 तक
साथ ही आपको बता दे सनातन धर्म के अनुसार " श्राद्ध कर्म करने का सबसे उत्तम समय प्रातः काल का माना जाता हैं . क्यूंकि यह समय देवो का उठने का माना जाता हैं." इस लिए श्राद्ध कर्म को जितनी जल्दी किया जाए उतना ही उत्तम हैं.  रात का वक्त राक्षसों का वक्त माना गया है. इसलिए रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए. वहीं संध्या के वक्त भी श्राद्ध कर्म करना सही नहीं माना जाता है